शनिवार, 3 दिसंबर 2011

वक़्त


जाने कहाँ रुक गया था वक़्त उस पल, जैसे नीम की साख (डाली) पै लटक गया हो,,, छुप्पा-छुप्पी खेल रहा हो !! में भी उन पलों के आगोश में घिर चुकी थी.. बहुत देर तलक झरोखों से देखती रही में .... उस इठलाते वक़्त के लम्हों को !

फिर कहाँ थी में एहसास भी ही न रहा ! कभी-कभी यूँ ही खामोश रहना भी कितना अच्छा लगता है ना !

*मनीष मेहता !

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