शनिवार, 3 दिसंबर 2011

"क्या लिखुँ .....?"



'फिर अंतर्मन में इक तूफ़ान सा आया, एहसासों का उफान चरम सीमा में था, इक अजीब सी हलचल होने लगी ! दिलों-दिमाग पै जोर नहीं चल रहा था... शब्दों से लड़ता रहा देर तलक, जितनी भी कोशिश की खुद को असहाय पाया ! क्या लिखना चाहता था जो लिख नहीं पा रहा था में !

सारी रात यही ज़द्दोजहद में गुजर रही सुबहा-सुबहा देखता तो कोरे कागज़ पै कुछ लफ्ज़ उभर आये थे ! "क्या लिखुँ ....." हाँ यही वो 
अलफ़ाज़ थे जिनको लिखने में इक और रात गुज़र रही थी मेरी !
चलिए इक और रात तुझे लिखने में गुजार देंगे हम ! '




सर्वाधिकार सुरक्षित 
*मनीष मेहता !

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