शनिवार, 3 दिसंबर 2011

यादों का धुवाँ


'कुछ देर यूँ ही फडफडाता रहा वक़्त का परिंदा चौखट पै मेरे, कुछ दूर ही तो खडा था मुझसे, सहमा-सहमा, डरा-डरा सा ! मुझे छूना चाहता हो जैसे, सोचता होगा कैद करके न रख लूं में उसे ! कुछ पुरानी यादें जेहन में बादलों की तरहा मडराने लगी, कानों पै गुनगुनाने लगी, बोली सुनो तुम्हारी अतीत हूँ में, वो पल हूँ जो अब तक संभाल रखे है तुमने अपने पलकों पै ! अगले ही पल उसे थाम लेने को मचलने लगा था में, यादों के झर...ोखों से उन हसीं पलों को देखना चाहता था !
ज्यूँ ही हाथ आगे बड़ाया, सामने कुछ भी ना था ! शायद ख्वाब होगा ! हाँ ख्वाब ही तो था ! पलके उठायी तो यादों का धुवाँ-धुवाँ सा था चारों तरफ !
ये यादों का धुवाँ आज फिर मेरी पलकों पै छा गया, यादों का धुवाँ आज फिर मेरी पलकों को भिगों गया ! यादों का धुवाँ आज फिर कुछ कही-अनकही बातों को दोहरा गया ! यादों का धुवाँ !'



सर्वाधिकार सुरक्षित 
*मनीष मेहता !
(१/१२/२०११)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें