शनिवार, 3 दिसंबर 2011

मन का पोस्मार्टम !



'अभी-अभी मन का पोस्मार्टम करके देखा, तो पाया कुछ तेरे एहसासों का इक तिनका अभी तक ज़िंदा था ! मचल रहे थे फिर से कुछ कहने को ! छू के देखा मैंने जो इससे अंकुर फूट आये थे, शायद फूल खिल उठेंगे अब ! महकने लगे थे रंगों फिजा में एहसासों के ये फूल ! सांसों की माला से पिरो के रख लूँगा इन्हें ये जो है तेरे एहसासों के फूल !

क्या मेरा एहसास भी अब तलक ज़िंदा होगा, तुम भी अपने मन को टटोलियेगा !'




सर्वाधिकार सुरक्षित 
*मनीष मेहता !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें