सोमवार, 14 नवंबर 2011

हाल-ए-दिल !

सुनो आ जाओ कि ये शाम ढलती नहीं तुम्हारे बिना, आके बैठों पास मेरे, देखूं तुम्हें कुछ इस कदर कि पलकों को भी न झपकने दूँ, धडकनों से करूँ दिल कि बातें खोलूं न लब में ! एहसासों में जी लूँ तुम्हें !
आँखों से सब कह दूँ कि ख़्वाबों के धागे जो बुने है पलकों तले, कुछ पल के लिए तुम्हारी आँखों में जी लूं में ! धडकने जो कह रही है तुमको वो फिर सुनाऊ में ! तुम्हारी साँसों की महक से अपने तन-मन को फिर से महकाऊं में !





ये शाम फिर से ढलने को है तुम्हारे बिना, वक़्त है कि गुजरता नहीं ! देखो चाँद फिर से निकल आया चांदनी कि तलाश में, तुम हो कि बेखबर से हो, दूर तलक कही दीखते नहीं ! 
आ जाओ न कि जी लूं फिर से अपनी ज़िन्दगी तुम्हारे हंसी बाहों में ! 



शायद तुमको नहीं खबर कि तुम्हारे सादगी और भोलेपन पर अपनी ज़िन्दगी लुटा देने को मन करता है, और बाद उसके जब तुम कहते हो कि मेरे साथ हर लम्हां तुम्हें मेरे पास होने का सा एहसास दिलाता है !
 सोचता हूँ कितने बेशकिमती लम्हें होंगे जो पास होने का एहसास दे जाते है, मेरी उदासियों के साये में उन जगमगाते रोशन करतों को शामिल कर दो, ताकि में तुम्हारे पीछे इन लम्हों को जी सकूं !

नहीं तो सच में तुम बिन मर जाने को ज़ी चाहता है !


मनीष मेहता !
सर्वाधिकार सुरक्षित  !