शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

"अधुरा ख्वाब !"



'कल फिर देखा था मैंने तुमको,
अपने ख्वाबों के आँगन में.
गालों पे लटकते दो लट,
आँखों पे चमचमाते सपने.
कुछ कही कुछ अनकही बातें,
कुछ ख्वाब कुछ हकीक़त,

छूने को मचलने लगा था में,
जुल्फों के आगोश में,
कैद होने की तमन्ना थी,
हाथ आगे बढाया तो,
सामने कोई नहीं था,
ख्वाब था शायद.......
हाँ ख्वाब ही होगा !!
बेचैन कर गया फिर मुझे
तुम्हारा इक अधुरा ख्वाब !

उफ्फ्फ्फ़ !!  तुम्हारा ख्याल, जीने नहीं देता मुझे !



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*मनीष मेहता !
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