शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

थामी जा चौमास थामी जा ! (कुमांउनी कविता )

"असमान में बादलोक घरघाट पड़ गो,
खेत-धूर-जंगल ले हरी-भरी हूण भगो !
हमर पाथर वाल *पाख ले फिर *चूड़ भगो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !!

गाड़-घदेरों में ले सरसराट पड़ गो,
नानथीनाक स्कूल जाण ले मुश्किल हे गो !
बूबुक गोरू गाँव जाड़क ले भेत हे गो...!
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !!


गाड़-घदेरुक पाड़ी ले *सरक पूज गो,
पाल बखाई खीम दा घट ले बंद हए गो !
जाग-जगां खेतों-भीड़ों में *छोई फूट गो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !!






अल्बेर चौमास दागे डरी ले लागन भगों,
किले की पिछाड बार हमर पहाडक भोते नुकसान कर गो !
हे इष्ट देवा हे चितई का गोल ज्यू मी बिनती लीबे फिर ए गो 
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !!"


*पाख -(छत)
*चूड़- (टपकना)
*सरक (असमान)
*छोई-  (बरसात में निकलने वाला जल श्रोत)








 (ये कविता में अपने प्यारे पहाड़ को समर्पित करता हूँ ! )


सर्वाधिकार सुरक्षित !
http://musafirhunyaro.blogspot.com /
(१५/०७/२०११ )

मनीष मेहता !