शनिवार, 25 जून 2011

हाँ मुहब्बत हो गई है...!

'हाँ मुहब्बत हो गई है,
मुझे तुमसे शायद..
कि.....
हर इक अहसास में,
तुम्हें जो महसूस किया मैंने !
छू के निकला,


इक झोखा अभी -अभी,
तुम्हारे ही खुसबू से
महका- महका सा !
ख्वाब देखा था जो मैंने,
 

तुम्हें ही पाने का,
सच सा लगा मुझे
फिर वही .....

अब कैसे कह दूँ,
कि मुहब्बत नहीं है तुमसे !!'







मनीष मेहता !
 
Copyright © 2011, 
http://manishmehta.weebly.com/







Surrender the Heart (Surrender to Destiny) 

शनिवार, 18 जून 2011

हो सके तो लौट आना किसी बहाने से !

"कल रात फिर तेरा ख्याल आया ! और ख्वाबों के शहर मैं भटकने लगा मुसाफिर की तरहा ! भटकते भटकते बहुत दूर तक निकल आया था....!
सुनसान पड़े सड़क मैं दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था,
ख्यालों मैं तुम थी, और आँखों में तुम्हारा चेहरा ! चले जा रहा था अपनी धुन मैं..! शायद तुम्हारी तलाश थी मुझे ! कुछ क़दम आगे बढाएं  तो सामने दौराहा देख कर अनायास सोचने लगा कि किस तरफ जाऊं ...! फिर अचानक ना चाहते हुए भी राईट साइड को मुंड  गया ..कुछ कदम चलते ही अचानक से एक नुक्कड़ पै तुम्हारी शक्ल से मिलती हुई शक्ल से रूबरू हुआ ! वही बड़ी-बड़ी आँखें, वही मासूम सा चेहरा, सब कुछ तो तुम्हारी तरहा ही था, शायद तुम ही थी वो ! मेरे सुस्त पड़े कदम अचानक से तेज़ हो गये.....! रात  के सन्नाटे में  मेरी धडकनों कि आवाद साफ़ सुनाई दे रही थी ! कुछ और क़दम आगे बड़ा और पास आके देखा तो सामने थी तुम ! थोडा सी मायूस और गुमसुम सी ! कितनी बेचेनी थी इन आखोँ में जैसे सदियो से कोई ख्वाब सजा रखा हो इनमे...तुमसे मिलने का........! तुम्हारी पलकों का उठना और फिर अदब से गिरना...दिल कि धड़कन बड़ा रहा था...! छूने को मचल रहा था तुम्हें....! 

क्या तुम अब भी नाराज़ हो मुझसे ..?  याद तो मेरी आती हो होगी ना..?? मुझसे बात नहीं करोगी ... ???
और भी ना जाने कितने सवालात कर बैठा था एक साथ मैं तुमसे....! बहुत सारी बातें जो करनी थी तुमसे... और सवालात भी ! तुम अब भी खामोश थी !
कुछ पल इंतजार किया शायद ये सोच के कि अपनी ख़ामोशी को तुम भी जुबां दोगी !
 अपने इन अहसासों को नाम दोगी ! फिर चुपके से
...तुमने अपनी पलकों को उठा कर देखा मुझे,
मेरे चहेरे कि रौनक देखने लायक थी उस पल ....तुम अब भी खामोश थी.शायद कुछ सोच रही थी तुम..! शायद मेरे अनगिनत सवालो का ज़वाब जो देना था तुम्हें.....! तुम्हारी पलकों में नमी थी...!
मैने होंसला करके क़दम आगे बढाया....शायद गले से लगाने कि आरज़ू थी मेरी....!! उफ्फ़ ये क्या.......??
सामने पड़े पत्थर से टकरा गया ..
सामने देखा .तो वहां ना तुम थी ना कोई ख़्वाब.... उजाले मैं आके देखा तो ...... पैर से खून रिस  रहा था.....शायद पत्थर नुकीला था.....!

तुम्हारा ख्याल जो अब तक दिल जलता था...अब ना जाने क्या क्या जलाएगा .....!!
ये तुम्हारा ख्याल ना ज़ीने नहीं देता है मुझे.............!!"



(तुम्हारी तलाश मैं भटक रहां हूँ ख्वाबों-ख्यालो में दर-बदर )
"टूट गया कोई तेरे जाने से, हो सके तो लौट आना किसी बहाने से....!"



मनीष मेहता !
Copyright © 2011, 
http://manishmehta.weebly.com/





(चित्र :- मनीष मेहता)


 

सोमवार, 13 जून 2011

ख़्वाबों में सताना तो छोड़ दो अब...!!

(चित्र- गूगल से )
रात का वो गुमनाम अँधेरा...आँखों में एक चमक सी जागी...सामने तुम्हारा ख्याल था!! रोशनी से नहाया था बदन तुम्हारा ..फिर तुमसे गुप्तगू होने लगी...आँखों आँखों में...कितनी बेचेनी थी इन आखोँ में जैसे सदियो से कोई ख्वाब सजा रखा हो इनमे...तुमसे मिलने का........! तुम्हारी पलकों का उठना और फिर अदब से गिरना...दिल कि धड़कन बड़ा रहा था...! छूने   को मचल रहा था तुम्हें....मैने होंसला करके क़दम आगे बढाया....शायद गले से लगाने कि आरज़ू थी मेरी....!! उफ्फ़ ये क्या.......?? दीवार से टकरा गया था में..... सर पै चोट  के निशाँ  कुछ बयान कर रहे थे...!!

गुज़रे हुए लम्हों कि कसीस ज़िंदा कर गई थी तुम. ख़्वाबों को मचलना सिखा गई थी तुम...आँखों को तडपना बता गई थी तुम. सच कहती हो तुम. मगर ये सच हें तो सच के आईने में तुम्हारी शक्ल क्यों धुंधली है आज...!
कही अपने चेहरे पै नकाब तो नहीं रखती थी तुम..??

कल और आज के चक्रब्यूह में फंस चुका था में..दिल कल कि बात करता और दीमाग आज में आके टिका था. खुद से भी बंट गया था में... जीवन के आईने में खुद कि शक्ल भी धुंधली पड़ गई थी आज.
तुम जाते जाते कितना कुछ बता गई थी तब...!! 
हाँ शायद.....कुछ तो रहा होगा दरमियान तेरे-मेरे....जो अब तलक  ज़िंदा है दिल के किसी कोने में. दफ़न  से कुछ ख्वाब जागने लगे थे....बार बार यूँ तडपना अच्छा तो नहीं है न.....!!
उमंगें भी न कितनी जल्दी बदलने लगती है...जागी उमंगों को जागी ही रहने दो अब ..!! 

"ख़्वाबों में  सताना तो छोड़ दो अब...!  बड़ा दुखाते है ये ख्वाब !!"









मनीष मेहता !

Copyright © 2011, 
http://manishmehta.weebly.com/






तुम्हें पाने का ख्वाब !!

(चित्र- गूगल से )
लम्हें सिमटने को थे. तुम्हारे छुहन को तरस रहे थे बाहें. पलकों पै नमी सी थी..वक़्त का वो लम्हा कितना खुबसूरत सा लगने लगा था......उमंगें जागने लगी. दिल मचलने लगा....सांसों कि रफ़्तार बदने लगी...बिखरे हुए सपनों को ख़्वाबों कि माला में पिरोने कि आरज़ू थी...और तुम्हारा चुपके से नज़र उठाना कितने बैचेन सी थी आँखें तुम्हारी...एक पल में सदियाँ जी गया था में जैसे .. उफ्फ्फ ये क्या तुम्हारी पलकों पै नमी. जहाँ बुनियाद हो वहाँ नमी अच्छी नहीं लगती...!!!

आसुओं और पलकों में जंग सी थी उस पल....में पलकों पै  तुम्हारी तस्वीर छुपा लेना चाहता  था ...और आंसू बहुत कुछ कहना चाहते थे...बहना चाहते थे...अरसे से थाम के जो रखा था इन्हे .....सजा लेना चाहता था में तुम्हारे अहसास को पलकों पै...मगर मेरी पलकें आंसुओं से दबी जा रही थी. कमज़ोर सी हो गई थी शायद ....बिखर सा गया था  में उस पल...जब इन भीगी पलकों से तुम इतना कुछ बोल गये थे....कभी कभी ख़ामोश रह के भी कितना कुछ कह जाती है न ये आँखें !!!

सूरज डूबने को था.. फिर से एक बार डूबता हुआ सूरज फिर से तेरे जाने कि फिक्र लेके आया......में तुम्हें आगोस में ले लेना चाहता था ...खो जाना चाहता था तुम्हारी बाहों के दरमियान ... दिन के उजालों के बाद जब रातों का अँधेरा छाता है न तो गम की बदली आके घेर लेती हें मुझे.....तुमको जाना था शायद...तुमसे बिछड़ने का दर अक्सर ये ख़याल लाता है काश  सूरज डूबता नहीं.......बस यही होता हमारे आँखों के सामने.. और तुम भी शायद जाने की जिद न करती.. कुछ ख्वाब कहा पुरे होते है... 

जैसे तुम्हें पाने का ख्वाब...!!










मनीष मेहता !

Copyright © 2011, 






शुक्रवार, 3 जून 2011

अंतहीन प्यार.. !! (भाग -5) !





प्रिया मनीष के सामने बैठ जाती है ...और धीरे से बोलती है !


प्रिया :- मनीष में आज भी तुमसे उतना ही प्यार करती हूँ....में खुद को फिर से तुम्हारे साथ देखना चाहती हूँ..! (उसकी आवाज़ में नमी है और पछतावा भी ) !


मनीष:- तुमने मुझे परखा है प्रिया  ! मुझमें खोट देखा तो बेरहमी से मुझे शूली पे चड़ा दिया !    और आज बेगुनाह पाया तो फिर से मेरे पास आ गये ...कल फिर से गुनहेगार होने का शक हुवा तो फिर से दुत्कार दोगे मुझे .......यही है न तुम्हारा प्यार ! प्यार तो अपनाता है न .. ठुकराता तो नहीं .. !  प्यार तो तुमसे अब तक करता हूँ ...लेकिन मुझे अब तुम्हारी जरुरत नहीं रही   ...


(प्रिया मनीष की बात काटते हुए बोलती है  ....)


प्रिया :- मुझपे यकीन करो मनीष !!


मनीष:- में गर गुनहेगार होता और तब तुम मेरे साथ आके खड़ी होती तो तुम्हारी मुहब्बत का  यकीं कर लेता में....


प्रिया:- कोन है मनीष  ऐसा जो गुनहेगार का साथ दे ..??


मनीष:- खुदा है न ! वो सबकी सुनता है और सबको माफ़ भी करता है ...फैसला करना आसान कर दिया है तुमने मेरे लिए ....!


प्रिया:- मेरी मुहब्बत का फैसला बिना सोचे समझे !


मनीष:- मुहब्बत करने वाले कभी किसी को तकलीफ नहीं देते है सिर्फ इबादत करने वाले देते है  ! में उस खुदा से मुहब्बत करता हूँ सिर्फ इबादत नहीं करता ! और सोचने-समझने के लायक ही कहा छोड़ा है  तुमने मुझे !


प्रिया :- अभी सब कुछ खत्म तो नहीं हुआ न ! और में उस वक़्त मजबूर थी ...!


मनीष:- और आज में ...! मेरी मुहब्बत सच्ची थी जो तुम्हें मेरे पास वापस ले आई...! तुम्हारी नहीं !! क्यूंकि तुम ही मुझे छोड़ के गये थे...!




प्रिया:- (कुछ सोचते हुए.) माफ़ तो कर सकते हो न...!


मनीष:- मेरे पास है क्या जो में माफ़ कर सकूँ .... ! 
मेरी माफ़ी से होगा क्या ? वेसे भी गुजरा वक़्त तो लौट नहीं आएगा न......काश तुमने मुझे तब गुनहेगार समझ के ही सही  माफ़ कर दिया होता न..!  हम्म्म 


 (एक गहरी साँस लेने लगता है ...)












जारी है ...!




A Story by Manish Mehta 
Copyright © 2011, manishmehta.weebly.com/






(चित्र- गूगल से ) 

बुधवार, 1 जून 2011

वो पागल लड़की !



"जाने फिर कितने दिन इंतजार में गुज़ार दिए उसने ! सुबहा से शाम अपने कमरे की खिड़की में लगे परदे के पीछे से झांकती रहती थी ! शायद उसके लौट आने का इंतजार था उसे ! और ये सोचती रहती की काश इक बार लौट के आता...!
मेरी बात सुनता मुझे फिर से समझ पाता ! दिन कुछ यूँ गुज़र रहे थे उसके जैसे रेगिस्थान में प्यासा तडपता  हुआ मृग ! इक इक कदम खिसक-खिसक के चल रहा हो, और हर अगले क़दम पै उससे अपनी मंजिल नज़र आ रही हो ! 

कुछ पल यूँ ही ख़ामोश रहने के बाद उसने डायरी 
के कोरे पन्नो में स्याई फेरी...! कुछ सब्द उभर आये .... "कितना याद आते हो तुम " ! और बहुत कुछ लिखना चाहती थी वो .. न जाने क्यूँ लफ्ज़ नहीं मिल रहे थे शायद ! .. कलम थम सी गई थी ...सांसें धधक रही थी, जैसे कि जलते हुए आग में घी डाल दिया हो ! आँखें लाल हो चुकी थी रो-रो के ! सामने पड़ी डायरी के पन्ने आँसुओं की बरसात में गीले हो गए थे ..! आँसूं वो सब कुछ कह गये थे जो शायद वो मुद्दतों से कहना चाहती थी....लिखना चाहती थी ! 
 



और बहुत लिखने कि कोशिस कि उसने...सिर्फ इतना लिख पाई...!
आज सांसें भी चुब रही है मेरी...धड़कने सिमट सी गई है ! जीने कि कोई आरज़ू नहीं !
आ जाओ अब, कि ज़िन्दगी कम सी है !!!





मनीष मेहता !
Copyright © 2011, 



(चित्र- गूगल से )