सोमवार, 30 मई 2011

प्यार कि गली !

तुम आये ज़िन्दगी मै पहली बार लगा ज़िन्दगी ज़ीने को दिल किया. कहीं से कोई आवाज़ आई किसी ने मुंह से कुछ नहीं कहा फिर भी पूरी कायनात ने सुना इकरारे-इश्क !! समूची दुनिया की प्रेम कविताओं के पन्ने फडफनाने लगे..!
कुछ बातें किताब में पढके नहीं समझी जा सकती है. मुह्बत्त भी उनमे से एक है..!
एक लफ्ज़ है मुह्बत्त .. अपने भीतर समूची कायनात को समेटे हुए ! इसकी पन्नो मै ज़िन्दगी के अनगिनत सच्चाईयां लिपटी हुई, यह ज़िन्दगी कि वीरानों में खिला एक फूल है जिसकी खुसबू से सारा 
ब्रमांड महकता है..!
उस रात बैचेन होकर सोया, फिर जागा बुदबुदाने लगा.....क्या उनको खबर थी होंठो पर जो मुहर लगया करते थे एक रोज़ ऐसी ख़ामोशी से टपकेंगी ..दुखती तकरीरे, बेचैन रूह का परिंदा घर के बाहरी बरामदे में फड-फाड़ते रहे सारी रात भर...
प्यार कि गली मै एक अजीब सा खिचाव है. यह जानते हुए कि इसकी डगर बड़ी पथरीली है, जोखिम भरी है.. फिर भी मनं उसी और भागता है...! बार बार दिल टूटता है फिर भी नए सिरे से प्यार को अपनाने मै ज़रा हिचक नहीं होती..प्यार एक ही जीवन मै कितनी बार प्यार दस्तक दे सकता है... कितनी बार होता है प्यार ...... आखिर क्या खोजते है हम प्यार के नाम पर जिसकी तलाश में भटकते ही रहते है उम्र भर..???
इसी कि तलाश मै मनं ज़िन्दगी भर भटकता फिरता है इसी कि तलाश मै.. प्यार के नाम पर ठगे जाते है...बार बार सच्चे परें कि चाहत उम्र भर मनं मै किसी कोने मै दबी रहती है...हम हमेशा इतराते रहते कि सच्चे प्रेम कि एक अनुभूति हमें एक बार तो छू ले.. चाहे फिर बर्बाद ही क्यूँ ना हो जाए उस कि तलाश में ही बार बार परें कि गलिओं में हम भटकते है...


मनीष मेहता !



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गुरुवार, 26 मई 2011

ख्वाब तकलीफ देते है..!

कभी कभी अपनी खुशकिस्मती पै यकीन नहीं होता ऐसा कैसे हो गया कि तुम मेरे हो गये.और इतनी आसानी से..यूँ जैसे मैने हाथ बढाया हो और तुम्हें पा लिया हो..!

पहली बात जाब आपको मैने देखा था उस रोज़........घर के सामने वाले बगीचे में बैठी थी तुम..में छत पै था उस वक़्त..,बड़े मशगुल थे खुद मे ही तुम... जैसे किसी कि परवाह ही न हो तुम्हें.लेकिन बड़े अच्छे भी.. पता नहीं तब क्यूँ तुम्हें देखना सा अच्छा लगा था उस पल ... ..हलाकि नहीं लगना चाहिए था..उस रात पहली बार सोचा था आपके बारे में..फिर सारी रात नीद नहीं आई थी...वैसे आपसे मुह्बत्त तो नहीं हुई थी, पर आपके बारे मे सोचना अच्छा लगा था मुझे..फिर तुमसे कई बार आमना-सामना हुआ..और हर बार दिल को काबू में रखना मुश्किल हुआ था मेरे लिए...में कभी पूजा नहीं करता था, लेकिन आपके लिए दुवा ज़रूर करने लगा था..और खुदा ने आपको मुझे ही दे दिया जैसे मेरे लिए ही बनाया था आपको उसने..अब तो में सारी उम्र इबादत करूँगा उसकी..शुक्र अदा करता रहूँगा उसका....आपसे जायदा इबादत और शुक्रिया अदा करना है उसका...!

ज़िन्दगी से गर ख्वाब निकल दिया जाए तो रह ही क्या जाता है
ख्वाब तकलीफ देते है..
मगर तकलीफ तो हकिकत भी देती है........न !!

मनीष मेहता !







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गुरुवार, 19 मई 2011

एक महका महका सा ख्वाब !!




मेरे अहसासों में छुपा-छुपी खेलती हुई.....
मेरे दर्द में समायी हुए आंसुओं के कतरों कि तरहा ..
मेरी सांसों में महकती हुई हवाओं कि तरहा..!
दिल में सुलगते दर्द के अंगारों में छुपी...!!
हाँ यही कही हो तुम...मेरे आस पास....गुम सी....!

मेरे बिस्तर पै सजे चांदर के सरवटों में...
दीवारों के कोनो में......
एक महका महका सा ख्वाब .. ...सामने टेबल पै पड़े कप में 
तुम्हारे लिपस्टिक के निशाँ...तुम्हारे होने का अहसास दिलाती है मुझे....
कमरे के एक कोने पै पड़े गिटार ...जिसपे मैने कभी कुछ धुन तुम्हारे लिए गुनगुनाये थे....
उनमें धूल की एक सुनहरी परत सी छाई है...और कुछ बिखरा सामान...
तुम्हारे अंतीम आगमन की याद को सज़ोयें है अब तक..


अचनाक से दरवाज़े पै किसी के दस्तक ने ख़्वाबों के समंदर में गोते लगाते हुए मनं को वापस हकीकत से रूबरू करवा दिया...!! एक और दिन तुम्हारी यादों के सहारे में गुज़र गया था...!!






मनीष मेहता ! 

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