बुधवार, 30 मार्च 2011

कितना याद आते हो !!

(कितना याद आते हो....!)
एक गुमनाम सा रिश्ता था वो...जो तुमने और मैने जिया था उस ...पल में...तुमने और मैने ख़्वाबों के धागों ...बुना था इसे ..और वक़्त के झोकों के साथ गहरा होता चला था....हर एक पल में पूरी ज़िन्दगी जी लेना चाहती थी तुम......और कुछ में भी शायद...शायद अगले पल में मेरे खो जाने का दर जो था तुम्हें.....उस पल में जब तुम मेरे आगोस में थी...एक ख्वाब बुना था मैने..में अभी उन ख़्वाबों की परतों को उखेल रहा हूँ.......शायद कुछ अहसास मिले तुम्हारे होने का... अभी-अभी एक झोंका मुझे छू के निकला....तुम्हारे खुसबू से महकता हुआ..
कितना याद आते हो तुम....

एक पल को तो यूँ लगा जैसे सब कुछ लौट आया हो...ख्वाब भी कितना सताते है न...शायद तुम्हें भूल पाना बस में नहीं ...
उस रोज़ कितना नाराज़ थी तुम....बात भी नहीं करना चाहती थी....जब मैने कहा था की बिल्कुल भी नहीं ..... तुमने पूछा था की कितना प्यार करते हो मुझसे...?? तुमने हाथों में पड़ी आइसक्रीम भी फैंक दी थी ...मुझे पता था आइसक्रीम कितनी भाती थी तुम्हें... ३ रोज़ तक बात भी न की थी तब..! और फिर खुद ३ दिन बाद कॉल करके मुझसे लड़ना कि.....और कहना .."मुझे मना भी नहीं सकते हो तुम....."जबकि तुम जानती थी....कोशिस करके में हार गया था .. कितने अजीब होते है न ये रिश्ते....छम से टूट पड़ते है सीसे कि तरहा ज्यूँ ही हमारी पकड़ कमज़ोर पड़ गई तो...!

ज़ारी है.

मनीष मेहता ! 



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मंगलवार, 8 मार्च 2011

अंतहीन प्यार ..(भाग -२)

अचानक से मनीष के हाथों के स्पर्श से प्रिया की दूर गई दृष्टि लौट आई.......ख़्वाबों से निकल के हकीकत में उससे सामने देख के प्रिया चोंकी... और खुद को सँभालते हुए बोली...

(यादों का सफ़र !)
प्रिया :-"मनीष तुम कब आये......?

मनीष:-  हम्म्म्म  बस यूँ ही २-३ मिनट पहले...!

प्रिया :- तो तुम चुपचाप क्या कर रहे थे...कुछ बोले क्यूँ नहीं..

मनीष:- तुम जानते हो न तुम्हें यूँ ख्यालों की दूनिया में खोये देखना कितना अच्छा लगता है मुझे ...वैसे क्या सोच रही थी अब ..??

प्रिया :- तो ठीक है तुम यूँ ही देखते रहा करो ......और कुछ हो भी नहीं सकता है तुम्हारा ....!

मनीष:- हा हा हा हा (हँसते हुए ..) कुछ न कुछ तो हो ही जायेगा .......तुम जो पास हो !
प्रिया:- तुमसे बातों में कभी जीती हूँ में ...

मनीष:- (प्रिया की बात को काटते हुए..)....और में तो खुद को भी आ चुका हूँ तुम्हारी सादगी पे...

प्रिया:- तुम dailouge अच्छे बोल लेते हो फिल्मों में क्यूँ नहीं जाते...

मनीष:- (मस्ती करते हुए..) राम गोपाल वर्मा फिल्म ही नहीं बना रहा है कोई

प्रिया:- हम्म्म्म बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे .(कुछ सोचते हुए ).....पता है मनीष !

मनीष प्रिया की बात को काटते हुए.........नहीं पता है बता दो ...

प्रिया:- उफ्फ्फों कितना बोलते हो तुम चुप भी रहा करो ....कभी..
हाँ में क्या कर रही थी .....पता नहीं कभी-कभी............(मनीष को देखती है वो खामोस है...) अब तुम्हें क्या हो गया...??

मनीष:- तुमने ही तो कहा चुप रहने को...!

प्रिया:- यार प्ल्ज्ज़ में कुछ कह रही हूँ............

मनीष:- अच्छा बाबा बोलो...

प्रिया............हाँ पता है कभी कभी मुझे ऐसा लगता है ....पता नहीं मुझे ऐसा लगता है कितना वक़्त का साथ है हमारा......

(मनीष प्रिया कि बात काटते हुए ..)

मनीष:- मुझ पै एतबार नहीं है क्या तुम्हें....

प्रिया:-एतबार का रिश्ता है क्या हमारे बीच....?

मनीष:- वही तो बनाना चाहता हूँ ......इजहार-ऐ-इश्क कर दिया तो भाग जाओगी तुम...

प्रिया:- शरमाने लगती है ......

मनीष:- में जानता हूँ कि छोटे सहर कि लड़किओं कि हाँ उनकी खामोसी में होती है उनके शर्माने में होती है......!

प्रिया हँसते हुए भाग जाती है ....और मनीष उसके पीछे-पीछे चला जाता है ....!!




जारी है .........!





मनीष मेहता !





A Story by Manish Mehta 
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