बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

मनीष-ऐ-महफ़िल.! (शेरों-शायरी)



१.
मुहब्बत कि नुमाइश करने वालों ..
मुहब्बत बिकती नहीं बाजारों में....!!

२.

गर मुहबत बिकती होती बाज़ारों में 'मनीष' ,
क़ीमत ज़िन्दगी भी होती तो दाव लगता ज़रूर...!!

३.
मिलता नहीं मेरा खुदा मुझसे आजकल,
लगता है दुवा उसकी कबूल हुई 'मनीष'...!!

४.

खुदा पै इलज़ामात लगता है तू 'मनीष;,
तुजे अपनी मुहब्बत पै यकीन नहीं शायद...!!

५.

तुम्हारी दुनिया को देख रहा हूँ में मुद्दतों से.
नुमाइश से ज़्यादा कुछ दिखा नहीं अब तलक ..!!

६.

मेरे हालातों का ज़िक्र न कर ऐ मनीष,' 
कपडे फटे सही इज्ज़त छुपाये रखता हूँ....!

७.

मरने का तो खॉप नहीं है तुझे,,
प्यार से फिर क्यूँ डरता है मनीष....!!

८.
खुदा से इबादत करने वालों पै यकीन नहीं करता मनीष,
में तो उससे मुहब्बत करता हूँ सिर्फ इबादत नहीं करता...!!


९.
इजहारे मुहब्बत करना ज़रूरी तो नहीं ..
आँखों से कहना दिल से समझना कम तो नहीं.. !!


१०.
भरा है दिल का हर एक कोना मुहबत से,
फिर भी क्या है कि हर पल उदास रहता है 'मनीष'..!!



*मनीष मेहता 





5 टिप्‍पणियां:

  1. Na karna numaaish apne dard,
    apne jazbaaton ki tu,
    mazak bana kr jab hasegi ye duniya,
    dard hoga har ehsaas me,
    aur mazboor muskurane par hoga tu.. !!


    Like the way.. Your words carry immense depth.. no one could explore the purity & beauty of ur words.. in words.. !!

    They are always adorable.. :) :) treasure these gems.. !! :) :)

    cares.. !!

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  2. Awsm again... u know mujhe tumhara likhaa padnaa acchaa lagta hae coz esme ek simplicity hoti hae honesty hoti hae purity hoti jo tuch karti hae dil ko...

    Keep wrtng love u & care u...:) :) :)

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  3. manish , khud ko kahi kho aaye ho lagta hai , intzar nahi arzoo kero tumko her khoi hui chiz vapas mil jaygi <<>>

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  4. आप सभी मित्रों का तहे दिल से शुक्रिया ! जुड़े रहिये !
    मेरी अन्य रचना भी पढियेगा !

    http://musafirhunyaro.blogspot.com/2011/06/5.html

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