शनिवार, 31 दिसंबर 2011

नूतन वर्ष की हार्दिक सुभकामनायें !


ये जो बरस बीत गया, जाने कितनी खुशियाँ दे गया ! कुछ लोगों ने ज़िन्दगी का हर पल महकाया, मेरी खुशियों की वज़हा बने ! मेरी सपनों को नयी उडान दी ! आप मित्रों के दुवाओं का असर है कि प्रगतिपथ में निरंतर अग्रसर हूँ ! 

मित्रों !!
ज़िन्दगी का कोई भी पल, कोई भी अवसर, कोई भी ख़ुशी तुम्हें याद किये बिना अधूरा सा लगता है ! 

"नयी सौगातें, नयी-नयी बातें !
नए दोस्त, नए सपने,
हर इक पल, हर इक रोज़
खुशियों के रंगों से
घर-आँगन महके !"
नूतन वर्ष का हर इक पल, आपकी ज़िन्दगी में खुशियों की बहार लाये, 

नूतन वर्ष कि आपको सहपरिवार हार्दिक सुभकामनायें !
मनीष मेहता व परिवार 

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

अंतहीन प्यार भाग- ७ ! ( इक झलक )


प्रिया- ओह्ह्ह सुबहा-सुबहा कितनी सिगरेट पीते हो मनीष .. पुरे कमरे में धुवाँ ही धुवाँ कर रखा है.... 
मनीष:- प्ल्ज़ प्रिया मत करो ...
(प्रिया सिगरेट मनीष के हाथ से छिनने लगती है, और छीनाझपटी में हाथ जला बैठती है.. )
... मनीष:- उफ्फो क्या करती हो प्रिया...में तुम्हें मना कर रहा हूँ तुम हो की सुनते नहीं ......! ( और उसके हाथ को पकड़ लेता है और ऊँगली को मुह पे ले लेता है, चूमने लगता है ... प्रिया ख़ामोश हो जाती है, मनीष सहम जाता है और प्यार भरी नज़रों से प्रिया की तरफ देखता है और धीरे से बोलता है )
मनीष- आज से मेरी सिगरेट बंद !
प्रिया:- सच्च ?
मनीष:- और क्या...... अब से में किसी भी ऐसी चीज़ को हाथ नहीं लगाऊंगा जो तुम्हें तकलीफ पहुंचाती है !
प्रिया:- तो पहले कहते न में पहले हाथ जला लेती...!
मनीष:- तुम मेरे लिए हाथ जला लेती ?
प्रिया:- तो क्या?
मनीष:- पागल हो पागल ......(और गले लगा लेता है )
प्रिया:- तुमसे बड़ी पागल तो नहीं हूँ न ..

प्रिया:- (प्रिया सिगरेट के टुकड़े को संभालती हुई ..) ..संभाल के रखूंगी !
मनीष:- सिगरेट के टुकड़े को ?
प्रिया:- हाँ ये तुम्हारी आखिरी सिगरेट जो है !
मनीष- प्रिया तुम भी ना... !
प्रिया- मनीष तुम तो जानते हो ना मुझे हर उस चीज़ से बेइंतहाँ मुहब्बत है जिससे तुमें मुहब्बत है !
मनीष- और मुझे तुमसे.......... !

जारी है -
ये अंश मेरी अप्रकाशित कहानी अंतहीन प्यार - भाग - ७ से ली गई है !
सर्वाधिकार सुरक्षित !
कहानी- मनीष मेहता !
चित्र - मनीष मेहता !

वक़्त


जाने कहाँ रुक गया था वक़्त उस पल, जैसे नीम की साख (डाली) पै लटक गया हो,,, छुप्पा-छुप्पी खेल रहा हो !! में भी उन पलों के आगोश में घिर चुकी थी.. बहुत देर तलक झरोखों से देखती रही में .... उस इठलाते वक़्त के लम्हों को !

फिर कहाँ थी में एहसास भी ही न रहा ! कभी-कभी यूँ ही खामोश रहना भी कितना अच्छा लगता है ना !

*मनीष मेहता !

यादों का धुवाँ


'कुछ देर यूँ ही फडफडाता रहा वक़्त का परिंदा चौखट पै मेरे, कुछ दूर ही तो खडा था मुझसे, सहमा-सहमा, डरा-डरा सा ! मुझे छूना चाहता हो जैसे, सोचता होगा कैद करके न रख लूं में उसे ! कुछ पुरानी यादें जेहन में बादलों की तरहा मडराने लगी, कानों पै गुनगुनाने लगी, बोली सुनो तुम्हारी अतीत हूँ में, वो पल हूँ जो अब तक संभाल रखे है तुमने अपने पलकों पै ! अगले ही पल उसे थाम लेने को मचलने लगा था में, यादों के झर...ोखों से उन हसीं पलों को देखना चाहता था !
ज्यूँ ही हाथ आगे बड़ाया, सामने कुछ भी ना था ! शायद ख्वाब होगा ! हाँ ख्वाब ही तो था ! पलके उठायी तो यादों का धुवाँ-धुवाँ सा था चारों तरफ !
ये यादों का धुवाँ आज फिर मेरी पलकों पै छा गया, यादों का धुवाँ आज फिर मेरी पलकों को भिगों गया ! यादों का धुवाँ आज फिर कुछ कही-अनकही बातों को दोहरा गया ! यादों का धुवाँ !'



सर्वाधिकार सुरक्षित 
*मनीष मेहता !
(१/१२/२०११)

"क्या लिखुँ .....?"



'फिर अंतर्मन में इक तूफ़ान सा आया, एहसासों का उफान चरम सीमा में था, इक अजीब सी हलचल होने लगी ! दिलों-दिमाग पै जोर नहीं चल रहा था... शब्दों से लड़ता रहा देर तलक, जितनी भी कोशिश की खुद को असहाय पाया ! क्या लिखना चाहता था जो लिख नहीं पा रहा था में !

सारी रात यही ज़द्दोजहद में गुजर रही सुबहा-सुबहा देखता तो कोरे कागज़ पै कुछ लफ्ज़ उभर आये थे ! "क्या लिखुँ ....." हाँ यही वो 
अलफ़ाज़ थे जिनको लिखने में इक और रात गुज़र रही थी मेरी !
चलिए इक और रात तुझे लिखने में गुजार देंगे हम ! '




सर्वाधिकार सुरक्षित 
*मनीष मेहता !

मन का पोस्मार्टम !



'अभी-अभी मन का पोस्मार्टम करके देखा, तो पाया कुछ तेरे एहसासों का इक तिनका अभी तक ज़िंदा था ! मचल रहे थे फिर से कुछ कहने को ! छू के देखा मैंने जो इससे अंकुर फूट आये थे, शायद फूल खिल उठेंगे अब ! महकने लगे थे रंगों फिजा में एहसासों के ये फूल ! सांसों की माला से पिरो के रख लूँगा इन्हें ये जो है तेरे एहसासों के फूल !

क्या मेरा एहसास भी अब तलक ज़िंदा होगा, तुम भी अपने मन को टटोलियेगा !'




सर्वाधिकार सुरक्षित 
*मनीष मेहता !

(प्रकृति की गोद में !


रात और दिन ...कितने खूबसूरत दो वक़्त है..और कितने खूबसूरत दो लव्ज़.. अब इन दो वक्तों के बीच एक वक़्त ऐसा भी आता हें जिसे शाम का वक़्त कहते है..यह ऐसा वक़्त है जिसे न रात अपनाती है .. न दिन अपने साथ लेके जाती है..अब इस छोड़े हुए या छूटे हुए लावारिस वक़्त से अक्सर कोई लम्हा चुन लेता हें.. और सी लेता हें अपने शेरो में....लेकिन कोई कोई शाम भी ऐसी बांज होती हें...की कोई वक़्त दे के नहीं जाता..कोई लम्हा देके नहीं जाता ...!!!




(प्रकृति की गोद में !! 

*मनीष मेहता !

सोमवार, 14 नवंबर 2011

हाल-ए-दिल !

सुनो आ जाओ कि ये शाम ढलती नहीं तुम्हारे बिना, आके बैठों पास मेरे, देखूं तुम्हें कुछ इस कदर कि पलकों को भी न झपकने दूँ, धडकनों से करूँ दिल कि बातें खोलूं न लब में ! एहसासों में जी लूँ तुम्हें !
आँखों से सब कह दूँ कि ख़्वाबों के धागे जो बुने है पलकों तले, कुछ पल के लिए तुम्हारी आँखों में जी लूं में ! धडकने जो कह रही है तुमको वो फिर सुनाऊ में ! तुम्हारी साँसों की महक से अपने तन-मन को फिर से महकाऊं में !





ये शाम फिर से ढलने को है तुम्हारे बिना, वक़्त है कि गुजरता नहीं ! देखो चाँद फिर से निकल आया चांदनी कि तलाश में, तुम हो कि बेखबर से हो, दूर तलक कही दीखते नहीं ! 
आ जाओ न कि जी लूं फिर से अपनी ज़िन्दगी तुम्हारे हंसी बाहों में ! 



शायद तुमको नहीं खबर कि तुम्हारे सादगी और भोलेपन पर अपनी ज़िन्दगी लुटा देने को मन करता है, और बाद उसके जब तुम कहते हो कि मेरे साथ हर लम्हां तुम्हें मेरे पास होने का सा एहसास दिलाता है !
 सोचता हूँ कितने बेशकिमती लम्हें होंगे जो पास होने का एहसास दे जाते है, मेरी उदासियों के साये में उन जगमगाते रोशन करतों को शामिल कर दो, ताकि में तुम्हारे पीछे इन लम्हों को जी सकूं !

नहीं तो सच में तुम बिन मर जाने को ज़ी चाहता है !


मनीष मेहता !
सर्वाधिकार सुरक्षित  !

शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

"अधुरा ख्वाब !"



'कल फिर देखा था मैंने तुमको,
अपने ख्वाबों के आँगन में.
गालों पे लटकते दो लट,
आँखों पे चमचमाते सपने.
कुछ कही कुछ अनकही बातें,
कुछ ख्वाब कुछ हकीक़त,

छूने को मचलने लगा था में,
जुल्फों के आगोश में,
कैद होने की तमन्ना थी,
हाथ आगे बढाया तो,
सामने कोई नहीं था,
ख्वाब था शायद.......
हाँ ख्वाब ही होगा !!
बेचैन कर गया फिर मुझे
तुम्हारा इक अधुरा ख्वाब !

उफ्फ्फ्फ़ !!  तुम्हारा ख्याल, जीने नहीं देता मुझे !



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*मनीष मेहता !
 —

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

थामी जा चौमास थामी जा ! (कुमांउनी कविता )

"असमान में बादलोक घरघाट पड़ गो,
खेत-धूर-जंगल ले हरी-भरी हूण भगो !
हमर पाथर वाल *पाख ले फिर *चूड़ भगो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !!

गाड़-घदेरों में ले सरसराट पड़ गो,
नानथीनाक स्कूल जाण ले मुश्किल हे गो !
बूबुक गोरू गाँव जाड़क ले भेत हे गो...!
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !!


गाड़-घदेरुक पाड़ी ले *सरक पूज गो,
पाल बखाई खीम दा घट ले बंद हए गो !
जाग-जगां खेतों-भीड़ों में *छोई फूट गो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !!






अल्बेर चौमास दागे डरी ले लागन भगों,
किले की पिछाड बार हमर पहाडक भोते नुकसान कर गो !
हे इष्ट देवा हे चितई का गोल ज्यू मी बिनती लीबे फिर ए गो 
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !
किले की दगडियों चौमासक बखत एगो !!"


*पाख -(छत)
*चूड़- (टपकना)
*सरक (असमान)
*छोई-  (बरसात में निकलने वाला जल श्रोत)








 (ये कविता में अपने प्यारे पहाड़ को समर्पित करता हूँ ! )


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(१५/०७/२०११ )

मनीष मेहता !

शनिवार, 25 जून 2011

हाँ मुहब्बत हो गई है...!

'हाँ मुहब्बत हो गई है,
मुझे तुमसे शायद..
कि.....
हर इक अहसास में,
तुम्हें जो महसूस किया मैंने !
छू के निकला,


इक झोखा अभी -अभी,
तुम्हारे ही खुसबू से
महका- महका सा !
ख्वाब देखा था जो मैंने,
 

तुम्हें ही पाने का,
सच सा लगा मुझे
फिर वही .....

अब कैसे कह दूँ,
कि मुहब्बत नहीं है तुमसे !!'







मनीष मेहता !
 
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Surrender the Heart (Surrender to Destiny) 

शनिवार, 18 जून 2011

हो सके तो लौट आना किसी बहाने से !

"कल रात फिर तेरा ख्याल आया ! और ख्वाबों के शहर मैं भटकने लगा मुसाफिर की तरहा ! भटकते भटकते बहुत दूर तक निकल आया था....!
सुनसान पड़े सड़क मैं दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था,
ख्यालों मैं तुम थी, और आँखों में तुम्हारा चेहरा ! चले जा रहा था अपनी धुन मैं..! शायद तुम्हारी तलाश थी मुझे ! कुछ क़दम आगे बढाएं  तो सामने दौराहा देख कर अनायास सोचने लगा कि किस तरफ जाऊं ...! फिर अचानक ना चाहते हुए भी राईट साइड को मुंड  गया ..कुछ कदम चलते ही अचानक से एक नुक्कड़ पै तुम्हारी शक्ल से मिलती हुई शक्ल से रूबरू हुआ ! वही बड़ी-बड़ी आँखें, वही मासूम सा चेहरा, सब कुछ तो तुम्हारी तरहा ही था, शायद तुम ही थी वो ! मेरे सुस्त पड़े कदम अचानक से तेज़ हो गये.....! रात  के सन्नाटे में  मेरी धडकनों कि आवाद साफ़ सुनाई दे रही थी ! कुछ और क़दम आगे बड़ा और पास आके देखा तो सामने थी तुम ! थोडा सी मायूस और गुमसुम सी ! कितनी बेचेनी थी इन आखोँ में जैसे सदियो से कोई ख्वाब सजा रखा हो इनमे...तुमसे मिलने का........! तुम्हारी पलकों का उठना और फिर अदब से गिरना...दिल कि धड़कन बड़ा रहा था...! छूने को मचल रहा था तुम्हें....! 

क्या तुम अब भी नाराज़ हो मुझसे ..?  याद तो मेरी आती हो होगी ना..?? मुझसे बात नहीं करोगी ... ???
और भी ना जाने कितने सवालात कर बैठा था एक साथ मैं तुमसे....! बहुत सारी बातें जो करनी थी तुमसे... और सवालात भी ! तुम अब भी खामोश थी !
कुछ पल इंतजार किया शायद ये सोच के कि अपनी ख़ामोशी को तुम भी जुबां दोगी !
 अपने इन अहसासों को नाम दोगी ! फिर चुपके से
...तुमने अपनी पलकों को उठा कर देखा मुझे,
मेरे चहेरे कि रौनक देखने लायक थी उस पल ....तुम अब भी खामोश थी.शायद कुछ सोच रही थी तुम..! शायद मेरे अनगिनत सवालो का ज़वाब जो देना था तुम्हें.....! तुम्हारी पलकों में नमी थी...!
मैने होंसला करके क़दम आगे बढाया....शायद गले से लगाने कि आरज़ू थी मेरी....!! उफ्फ़ ये क्या.......??
सामने पड़े पत्थर से टकरा गया ..
सामने देखा .तो वहां ना तुम थी ना कोई ख़्वाब.... उजाले मैं आके देखा तो ...... पैर से खून रिस  रहा था.....शायद पत्थर नुकीला था.....!

तुम्हारा ख्याल जो अब तक दिल जलता था...अब ना जाने क्या क्या जलाएगा .....!!
ये तुम्हारा ख्याल ना ज़ीने नहीं देता है मुझे.............!!"



(तुम्हारी तलाश मैं भटक रहां हूँ ख्वाबों-ख्यालो में दर-बदर )
"टूट गया कोई तेरे जाने से, हो सके तो लौट आना किसी बहाने से....!"



मनीष मेहता !
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(चित्र :- मनीष मेहता)


 

सोमवार, 13 जून 2011

ख़्वाबों में सताना तो छोड़ दो अब...!!

(चित्र- गूगल से )
रात का वो गुमनाम अँधेरा...आँखों में एक चमक सी जागी...सामने तुम्हारा ख्याल था!! रोशनी से नहाया था बदन तुम्हारा ..फिर तुमसे गुप्तगू होने लगी...आँखों आँखों में...कितनी बेचेनी थी इन आखोँ में जैसे सदियो से कोई ख्वाब सजा रखा हो इनमे...तुमसे मिलने का........! तुम्हारी पलकों का उठना और फिर अदब से गिरना...दिल कि धड़कन बड़ा रहा था...! छूने   को मचल रहा था तुम्हें....मैने होंसला करके क़दम आगे बढाया....शायद गले से लगाने कि आरज़ू थी मेरी....!! उफ्फ़ ये क्या.......?? दीवार से टकरा गया था में..... सर पै चोट  के निशाँ  कुछ बयान कर रहे थे...!!

गुज़रे हुए लम्हों कि कसीस ज़िंदा कर गई थी तुम. ख़्वाबों को मचलना सिखा गई थी तुम...आँखों को तडपना बता गई थी तुम. सच कहती हो तुम. मगर ये सच हें तो सच के आईने में तुम्हारी शक्ल क्यों धुंधली है आज...!
कही अपने चेहरे पै नकाब तो नहीं रखती थी तुम..??

कल और आज के चक्रब्यूह में फंस चुका था में..दिल कल कि बात करता और दीमाग आज में आके टिका था. खुद से भी बंट गया था में... जीवन के आईने में खुद कि शक्ल भी धुंधली पड़ गई थी आज.
तुम जाते जाते कितना कुछ बता गई थी तब...!! 
हाँ शायद.....कुछ तो रहा होगा दरमियान तेरे-मेरे....जो अब तलक  ज़िंदा है दिल के किसी कोने में. दफ़न  से कुछ ख्वाब जागने लगे थे....बार बार यूँ तडपना अच्छा तो नहीं है न.....!!
उमंगें भी न कितनी जल्दी बदलने लगती है...जागी उमंगों को जागी ही रहने दो अब ..!! 

"ख़्वाबों में  सताना तो छोड़ दो अब...!  बड़ा दुखाते है ये ख्वाब !!"









मनीष मेहता !

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तुम्हें पाने का ख्वाब !!

(चित्र- गूगल से )
लम्हें सिमटने को थे. तुम्हारे छुहन को तरस रहे थे बाहें. पलकों पै नमी सी थी..वक़्त का वो लम्हा कितना खुबसूरत सा लगने लगा था......उमंगें जागने लगी. दिल मचलने लगा....सांसों कि रफ़्तार बदने लगी...बिखरे हुए सपनों को ख़्वाबों कि माला में पिरोने कि आरज़ू थी...और तुम्हारा चुपके से नज़र उठाना कितने बैचेन सी थी आँखें तुम्हारी...एक पल में सदियाँ जी गया था में जैसे .. उफ्फ्फ ये क्या तुम्हारी पलकों पै नमी. जहाँ बुनियाद हो वहाँ नमी अच्छी नहीं लगती...!!!

आसुओं और पलकों में जंग सी थी उस पल....में पलकों पै  तुम्हारी तस्वीर छुपा लेना चाहता  था ...और आंसू बहुत कुछ कहना चाहते थे...बहना चाहते थे...अरसे से थाम के जो रखा था इन्हे .....सजा लेना चाहता था में तुम्हारे अहसास को पलकों पै...मगर मेरी पलकें आंसुओं से दबी जा रही थी. कमज़ोर सी हो गई थी शायद ....बिखर सा गया था  में उस पल...जब इन भीगी पलकों से तुम इतना कुछ बोल गये थे....कभी कभी ख़ामोश रह के भी कितना कुछ कह जाती है न ये आँखें !!!

सूरज डूबने को था.. फिर से एक बार डूबता हुआ सूरज फिर से तेरे जाने कि फिक्र लेके आया......में तुम्हें आगोस में ले लेना चाहता था ...खो जाना चाहता था तुम्हारी बाहों के दरमियान ... दिन के उजालों के बाद जब रातों का अँधेरा छाता है न तो गम की बदली आके घेर लेती हें मुझे.....तुमको जाना था शायद...तुमसे बिछड़ने का दर अक्सर ये ख़याल लाता है काश  सूरज डूबता नहीं.......बस यही होता हमारे आँखों के सामने.. और तुम भी शायद जाने की जिद न करती.. कुछ ख्वाब कहा पुरे होते है... 

जैसे तुम्हें पाने का ख्वाब...!!










मनीष मेहता !

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शुक्रवार, 3 जून 2011

अंतहीन प्यार.. !! (भाग -5) !





प्रिया मनीष के सामने बैठ जाती है ...और धीरे से बोलती है !


प्रिया :- मनीष में आज भी तुमसे उतना ही प्यार करती हूँ....में खुद को फिर से तुम्हारे साथ देखना चाहती हूँ..! (उसकी आवाज़ में नमी है और पछतावा भी ) !


मनीष:- तुमने मुझे परखा है प्रिया  ! मुझमें खोट देखा तो बेरहमी से मुझे शूली पे चड़ा दिया !    और आज बेगुनाह पाया तो फिर से मेरे पास आ गये ...कल फिर से गुनहेगार होने का शक हुवा तो फिर से दुत्कार दोगे मुझे .......यही है न तुम्हारा प्यार ! प्यार तो अपनाता है न .. ठुकराता तो नहीं .. !  प्यार तो तुमसे अब तक करता हूँ ...लेकिन मुझे अब तुम्हारी जरुरत नहीं रही   ...


(प्रिया मनीष की बात काटते हुए बोलती है  ....)


प्रिया :- मुझपे यकीन करो मनीष !!


मनीष:- में गर गुनहेगार होता और तब तुम मेरे साथ आके खड़ी होती तो तुम्हारी मुहब्बत का  यकीं कर लेता में....


प्रिया:- कोन है मनीष  ऐसा जो गुनहेगार का साथ दे ..??


मनीष:- खुदा है न ! वो सबकी सुनता है और सबको माफ़ भी करता है ...फैसला करना आसान कर दिया है तुमने मेरे लिए ....!


प्रिया:- मेरी मुहब्बत का फैसला बिना सोचे समझे !


मनीष:- मुहब्बत करने वाले कभी किसी को तकलीफ नहीं देते है सिर्फ इबादत करने वाले देते है  ! में उस खुदा से मुहब्बत करता हूँ सिर्फ इबादत नहीं करता ! और सोचने-समझने के लायक ही कहा छोड़ा है  तुमने मुझे !


प्रिया :- अभी सब कुछ खत्म तो नहीं हुआ न ! और में उस वक़्त मजबूर थी ...!


मनीष:- और आज में ...! मेरी मुहब्बत सच्ची थी जो तुम्हें मेरे पास वापस ले आई...! तुम्हारी नहीं !! क्यूंकि तुम ही मुझे छोड़ के गये थे...!




प्रिया:- (कुछ सोचते हुए.) माफ़ तो कर सकते हो न...!


मनीष:- मेरे पास है क्या जो में माफ़ कर सकूँ .... ! 
मेरी माफ़ी से होगा क्या ? वेसे भी गुजरा वक़्त तो लौट नहीं आएगा न......काश तुमने मुझे तब गुनहेगार समझ के ही सही  माफ़ कर दिया होता न..!  हम्म्म 


 (एक गहरी साँस लेने लगता है ...)












जारी है ...!




A Story by Manish Mehta 
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(चित्र- गूगल से ) 

बुधवार, 1 जून 2011

वो पागल लड़की !



"जाने फिर कितने दिन इंतजार में गुज़ार दिए उसने ! सुबहा से शाम अपने कमरे की खिड़की में लगे परदे के पीछे से झांकती रहती थी ! शायद उसके लौट आने का इंतजार था उसे ! और ये सोचती रहती की काश इक बार लौट के आता...!
मेरी बात सुनता मुझे फिर से समझ पाता ! दिन कुछ यूँ गुज़र रहे थे उसके जैसे रेगिस्थान में प्यासा तडपता  हुआ मृग ! इक इक कदम खिसक-खिसक के चल रहा हो, और हर अगले क़दम पै उससे अपनी मंजिल नज़र आ रही हो ! 

कुछ पल यूँ ही ख़ामोश रहने के बाद उसने डायरी 
के कोरे पन्नो में स्याई फेरी...! कुछ सब्द उभर आये .... "कितना याद आते हो तुम " ! और बहुत कुछ लिखना चाहती थी वो .. न जाने क्यूँ लफ्ज़ नहीं मिल रहे थे शायद ! .. कलम थम सी गई थी ...सांसें धधक रही थी, जैसे कि जलते हुए आग में घी डाल दिया हो ! आँखें लाल हो चुकी थी रो-रो के ! सामने पड़ी डायरी के पन्ने आँसुओं की बरसात में गीले हो गए थे ..! आँसूं वो सब कुछ कह गये थे जो शायद वो मुद्दतों से कहना चाहती थी....लिखना चाहती थी ! 
 



और बहुत लिखने कि कोशिस कि उसने...सिर्फ इतना लिख पाई...!
आज सांसें भी चुब रही है मेरी...धड़कने सिमट सी गई है ! जीने कि कोई आरज़ू नहीं !
आ जाओ अब, कि ज़िन्दगी कम सी है !!!





मनीष मेहता !
Copyright © 2011, 



(चित्र- गूगल से ) 

 

सोमवार, 30 मई 2011

प्यार कि गली !

तुम आये ज़िन्दगी मै पहली बार लगा ज़िन्दगी ज़ीने को दिल किया. कहीं से कोई आवाज़ आई किसी ने मुंह से कुछ नहीं कहा फिर भी पूरी कायनात ने सुना इकरारे-इश्क !! समूची दुनिया की प्रेम कविताओं के पन्ने फडफनाने लगे..!
कुछ बातें किताब में पढके नहीं समझी जा सकती है. मुह्बत्त भी उनमे से एक है..!
एक लफ्ज़ है मुह्बत्त .. अपने भीतर समूची कायनात को समेटे हुए ! इसकी पन्नो मै ज़िन्दगी के अनगिनत सच्चाईयां लिपटी हुई, यह ज़िन्दगी कि वीरानों में खिला एक फूल है जिसकी खुसबू से सारा 
ब्रमांड महकता है..!
उस रात बैचेन होकर सोया, फिर जागा बुदबुदाने लगा.....क्या उनको खबर थी होंठो पर जो मुहर लगया करते थे एक रोज़ ऐसी ख़ामोशी से टपकेंगी ..दुखती तकरीरे, बेचैन रूह का परिंदा घर के बाहरी बरामदे में फड-फाड़ते रहे सारी रात भर...
प्यार कि गली मै एक अजीब सा खिचाव है. यह जानते हुए कि इसकी डगर बड़ी पथरीली है, जोखिम भरी है.. फिर भी मनं उसी और भागता है...! बार बार दिल टूटता है फिर भी नए सिरे से प्यार को अपनाने मै ज़रा हिचक नहीं होती..प्यार एक ही जीवन मै कितनी बार प्यार दस्तक दे सकता है... कितनी बार होता है प्यार ...... आखिर क्या खोजते है हम प्यार के नाम पर जिसकी तलाश में भटकते ही रहते है उम्र भर..???
इसी कि तलाश मै मनं ज़िन्दगी भर भटकता फिरता है इसी कि तलाश मै.. प्यार के नाम पर ठगे जाते है...बार बार सच्चे परें कि चाहत उम्र भर मनं मै किसी कोने मै दबी रहती है...हम हमेशा इतराते रहते कि सच्चे प्रेम कि एक अनुभूति हमें एक बार तो छू ले.. चाहे फिर बर्बाद ही क्यूँ ना हो जाए उस कि तलाश में ही बार बार परें कि गलिओं में हम भटकते है...


मनीष मेहता !



Copyright © 2011, 

गुरुवार, 26 मई 2011

ख्वाब तकलीफ देते है..!

कभी कभी अपनी खुशकिस्मती पै यकीन नहीं होता ऐसा कैसे हो गया कि तुम मेरे हो गये.और इतनी आसानी से..यूँ जैसे मैने हाथ बढाया हो और तुम्हें पा लिया हो..!

पहली बात जाब आपको मैने देखा था उस रोज़........घर के सामने वाले बगीचे में बैठी थी तुम..में छत पै था उस वक़्त..,बड़े मशगुल थे खुद मे ही तुम... जैसे किसी कि परवाह ही न हो तुम्हें.लेकिन बड़े अच्छे भी.. पता नहीं तब क्यूँ तुम्हें देखना सा अच्छा लगा था उस पल ... ..हलाकि नहीं लगना चाहिए था..उस रात पहली बार सोचा था आपके बारे में..फिर सारी रात नीद नहीं आई थी...वैसे आपसे मुह्बत्त तो नहीं हुई थी, पर आपके बारे मे सोचना अच्छा लगा था मुझे..फिर तुमसे कई बार आमना-सामना हुआ..और हर बार दिल को काबू में रखना मुश्किल हुआ था मेरे लिए...में कभी पूजा नहीं करता था, लेकिन आपके लिए दुवा ज़रूर करने लगा था..और खुदा ने आपको मुझे ही दे दिया जैसे मेरे लिए ही बनाया था आपको उसने..अब तो में सारी उम्र इबादत करूँगा उसकी..शुक्र अदा करता रहूँगा उसका....आपसे जायदा इबादत और शुक्रिया अदा करना है उसका...!

ज़िन्दगी से गर ख्वाब निकल दिया जाए तो रह ही क्या जाता है
ख्वाब तकलीफ देते है..
मगर तकलीफ तो हकिकत भी देती है........न !!

मनीष मेहता !







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गुरुवार, 19 मई 2011

एक महका महका सा ख्वाब !!




मेरे अहसासों में छुपा-छुपी खेलती हुई.....
मेरे दर्द में समायी हुए आंसुओं के कतरों कि तरहा ..
मेरी सांसों में महकती हुई हवाओं कि तरहा..!
दिल में सुलगते दर्द के अंगारों में छुपी...!!
हाँ यही कही हो तुम...मेरे आस पास....गुम सी....!

मेरे बिस्तर पै सजे चांदर के सरवटों में...
दीवारों के कोनो में......
एक महका महका सा ख्वाब .. ...सामने टेबल पै पड़े कप में 
तुम्हारे लिपस्टिक के निशाँ...तुम्हारे होने का अहसास दिलाती है मुझे....
कमरे के एक कोने पै पड़े गिटार ...जिसपे मैने कभी कुछ धुन तुम्हारे लिए गुनगुनाये थे....
उनमें धूल की एक सुनहरी परत सी छाई है...और कुछ बिखरा सामान...
तुम्हारे अंतीम आगमन की याद को सज़ोयें है अब तक..


अचनाक से दरवाज़े पै किसी के दस्तक ने ख़्वाबों के समंदर में गोते लगाते हुए मनं को वापस हकीकत से रूबरू करवा दिया...!! एक और दिन तुम्हारी यादों के सहारे में गुज़र गया था...!!






मनीष मेहता ! 

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