शनिवार, 31 दिसंबर 2011

नूतन वर्ष की हार्दिक सुभकामनायें !


ये जो बरस बीत गया, जाने कितनी खुशियाँ दे गया ! कुछ लोगों ने ज़िन्दगी का हर पल महकाया, मेरी खुशियों की वज़हा बने ! मेरी सपनों को नयी उडान दी ! आप मित्रों के दुवाओं का असर है कि प्रगतिपथ में निरंतर अग्रसर हूँ ! 

मित्रों !!
ज़िन्दगी का कोई भी पल, कोई भी अवसर, कोई भी ख़ुशी तुम्हें याद किये बिना अधूरा सा लगता है ! 

"नयी सौगातें, नयी-नयी बातें !
नए दोस्त, नए सपने,
हर इक पल, हर इक रोज़
खुशियों के रंगों से
घर-आँगन महके !"
नूतन वर्ष का हर इक पल, आपकी ज़िन्दगी में खुशियों की बहार लाये, 

नूतन वर्ष कि आपको सहपरिवार हार्दिक सुभकामनायें !
मनीष मेहता व परिवार 

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

अंतहीन प्यार भाग- ७ ! ( इक झलक )


प्रिया- ओह्ह्ह सुबहा-सुबहा कितनी सिगरेट पीते हो मनीष .. पुरे कमरे में धुवाँ ही धुवाँ कर रखा है.... 
मनीष:- प्ल्ज़ प्रिया मत करो ...
(प्रिया सिगरेट मनीष के हाथ से छिनने लगती है, और छीनाझपटी में हाथ जला बैठती है.. )
... मनीष:- उफ्फो क्या करती हो प्रिया...में तुम्हें मना कर रहा हूँ तुम हो की सुनते नहीं ......! ( और उसके हाथ को पकड़ लेता है और ऊँगली को मुह पे ले लेता है, चूमने लगता है ... प्रिया ख़ामोश हो जाती है, मनीष सहम जाता है और प्यार भरी नज़रों से प्रिया की तरफ देखता है और धीरे से बोलता है )
मनीष- आज से मेरी सिगरेट बंद !
प्रिया:- सच्च ?
मनीष:- और क्या...... अब से में किसी भी ऐसी चीज़ को हाथ नहीं लगाऊंगा जो तुम्हें तकलीफ पहुंचाती है !
प्रिया:- तो पहले कहते न में पहले हाथ जला लेती...!
मनीष:- तुम मेरे लिए हाथ जला लेती ?
प्रिया:- तो क्या?
मनीष:- पागल हो पागल ......(और गले लगा लेता है )
प्रिया:- तुमसे बड़ी पागल तो नहीं हूँ न ..

प्रिया:- (प्रिया सिगरेट के टुकड़े को संभालती हुई ..) ..संभाल के रखूंगी !
मनीष:- सिगरेट के टुकड़े को ?
प्रिया:- हाँ ये तुम्हारी आखिरी सिगरेट जो है !
मनीष- प्रिया तुम भी ना... !
प्रिया- मनीष तुम तो जानते हो ना मुझे हर उस चीज़ से बेइंतहाँ मुहब्बत है जिससे तुमें मुहब्बत है !
मनीष- और मुझे तुमसे.......... !

जारी है -
ये अंश मेरी अप्रकाशित कहानी अंतहीन प्यार - भाग - ७ से ली गई है !
सर्वाधिकार सुरक्षित !
कहानी- मनीष मेहता !
चित्र - मनीष मेहता !

वक़्त


जाने कहाँ रुक गया था वक़्त उस पल, जैसे नीम की साख (डाली) पै लटक गया हो,,, छुप्पा-छुप्पी खेल रहा हो !! में भी उन पलों के आगोश में घिर चुकी थी.. बहुत देर तलक झरोखों से देखती रही में .... उस इठलाते वक़्त के लम्हों को !

फिर कहाँ थी में एहसास भी ही न रहा ! कभी-कभी यूँ ही खामोश रहना भी कितना अच्छा लगता है ना !

*मनीष मेहता !